25/10/07

ख़त का जवाब


भेजकर ख़त हल-ए-दिल अपना,
अब उसके जवाब का इंतेज़ार करता हूँ
मेरे ख़त का जवाब जल्दी से आये,
बस यही दुआ बार-बार करता हूँ

देर से बैठा मैं तकता हूँ परिंदों को,
कोई मेरे दरवाजे पर दस्तक नही करता,
ख़त तो लाते है ले जाते है सभी पर
कोई मेरे नाम कि आवाज़ नही करता

मेरे दिल को भी अब न जाने क्या हो गया है,
मुझसे अब ये बरोबर वफ़ा नही करता
जब मै पुछ्ता हूँ इससे ख़त कि देरी का सबब,
ये भी मेरे महबूब की तरह खामोश रहता है,
कोई धड्कन नही करता।

प्रवीण परिहार

2 टिप्‍पणियां:

अनुनाद सिंह ने कहा…

मोबाइल के जमाने में खत ?

डाॅ रामजी गिरि ने कहा…

देर से बैठा मैं तकता हूँ परिंदों को,
कोई मेरे दरवाजे पर दस्तक नही करता,

जवाब ज़रूर आयेगा , इंतजार में सिद्दत लाइए .

रचना अच्छी है.