21/6/06

इशक होता नही सभी के लिए


इशक होता नही सभी के लिए,
ये बना है किसी-किसी के लिए,
कोई महबूब लाजमी नही आशिकी के लिए,
महबूब का खयाल ही काफी है शायरी के लिए,
उस खयाल को किसी रूह या सुरत की जरूरत नही होती,
हम आँखें मूंद लेते है महबूब के दिदार के लिए।


प्रवीण परिहार

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

इश्क़ को लफ़्ज़ों में बाँध पाना मुश्किल है,
ये वो साज़ है जो हर दिल में बजता नहीं।
जिसे न देखा, न छुआ, फिर भी महसूस किया,
वो महबूब है — जो कभी मिला ही नहीं।

उसके खयालों की खुशबू से महकती है रूह,
जैसे चाँदनी रात में कोई दुआ उतरती हो।
न उसने कुछ कहा, न हमने कुछ सुना,
फिर भी हर ख़ामोशी में वो ही बातें करता हो।

चेहरा ज़रूरी नहीं होता मोहब्बत के लिए,
कभी-कभी एक नाम ही उम्र भर जीने का सबब होता है।
हम आँखें मूंद लेते हैं बस उसकी याद के लिए,
क्योंकि रूह को रूह से मिलने में वक़्त नहीं लगता।
Poetic Continuation by ChatGPT