9/9/06

दुरियों के दरमियां




मैं यहाँ और तू वहाँ
ये दुरियों हैं दरमियां।
शुकरीयाँ इन दुरियों का,
तुम मिली जिन दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
मिलते है दिल को रास्ते।
और कभी मिलती है मंजिल,
उन रास्तों के दरमियां ।।

इन दुरियों के दरमियां,
तन्हाईयों का है बसर।
और बस तेरा खयाल,
इन तन्हाईयों के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
मैं तेरे करीब आया सनम,
दिल ने तुझे पाया करीब,
इन दुरियों के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
हर रोज मैं तुमसे मिला।
थे यहाँ बस तुम और मैं,
और कुछ नही था दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
जाग कर देखे है ख्वाब।
और मैं कभी सोया नही,
इन ख्वाबों के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
भाँती नही महफिल मुझे।
कुछ खोया रहता हूँ मैं,
इन महफिलों के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
दिल यूँ धडकता है मेरा।
नाम लेता है तेरा ये अब,
दो धडकनों के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
तेरे ख्यालों का कारवाँ।
मैं देर तक चलता रहा,
इस कारवाँ के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
मैं मूंद लू अपनी पलक।
और तुम यहाँ मौजूद हो,
इन दो पलक के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
इक जरा सा दर्द भी।
और मिठी सी कशीश है,
इस दर्द के दरमियां।।

इन दुरियों के दरमियां,
दिल ने मिटाई ये दुरियां।
अब तो है अपनी मौहब्बत,
इन दो दिलों के दरमियां।।

अब जो अपने दरमियां,
ये दुरियों बस कहने को है।
देख हम हुए कितने करीब,
इन दुरियों के दरमियां।।


प्रवीण परिहार

8/8/06

विवाह


हमारे मानव समाज में विवाह की बहुत मानयता है। ये विवाह का विचित्र बन्धन सदियों से ही हमारे समाज का अंग रहा है। इस बन्धन को समझने का प्रयास मैं अपनी एस कविता में कर रहा हूँ।

विवाह

ये विवाह इक बन्धन ऐसा,
इक रेशम की डोरी जैसा,
इस डोरी में विश्वास का बल है,
हिमालय के पर्वत जैसा ।

इस बन्धन की आत्मा प्रेम है,
इस बन्धन के मायने प्रेम है,
दोनो ने इक होकर जाना,
वो दो जिस्म पर जान एक है।

इस बन्धन की गाँठ निराली,
जो कहो वो बात निराली,
घर सजे यूँ जैसे दिवाली,
और तुलसी वाली बात निराली।

इस बन्धन का रंग है पीला,
जिस पर छाया वो रंगीला,
इस रंग से दुल्हन शरमायी,
और देखो दुल्हा बना सजीला।

इस बन्धन के सात वचन,
जैसे सुर के सात भजन,
जिसने जाना इन वचनो को,
साथ रहे वो सात जनम।

प्यार-मौहब्बत धन-दोलत भारी,
तुम्हारी हो ये खुशीयाँ सारी,
इस बन्धन से सबकी यारी,
आज तुम्हारी कल हमारी बारी।

प्रवीण परिहार

7/7/06

कौन है गालिब ?




यह आपने जरुर सुना होगा
"वो पुछते हैं कि गालिब कौन है,
कोई बतलाए कि हम बतलाए क्या।"
यह बतलाने कि कोशिश मैंने कुछ इस तरह की;

कौन है गालिब ?

आशिक की वफा गालिब,
हुस्न की अदा गालिब,

मौहब्बत की गजल गालिब,
खामोशी की जुबाँ गालिब,

इश्क का सबक गालिब,
बेखुदी का सबब गालिब,

इकरार की हया गालिब,
इनकार की सजा गालिब,

महफिल की शमा गालिब,
तन्हाई की गुफ्तगु गालिब,

शायर का ख्याल गालिब,
सुखनवर का अंदाज गालिब,

मिलन की अरजू गालिब,
जुदाई का सरुर गालिब,

उस के दिल की बात गालिब,
मेरे दिल का राज गालिब,

और ज्यादा क्या कहूँ मैं
हम सबके दिल का हाल गालिब।

प्रवीण परिहार

5/7/06

पुकारता है घर मेरा



इतने दिनों तक घर से दुर रहने के बाद घर की बहुत याद आती है। घरवालें, दोस्त, त्यौहार सभी कुछ।सभी पुकार-पुकार कर यहीं कहते है "अब तो आजा"।


पुकारता है घर मेरा
कहता है अब तो आजा।

वो रास्ते वो हर गली,
वो हर दर, वो दरवाजा,
करते है सब तकाजा,
कहते हैं अब तो आजा।

फाल्गुन की देखो होली,
उडधंग मचाती टोली,
होली के सारे रंग,
सब दोस्तो के संग,
करते है सब तकाजा,
कहते हैं अब तो आजा।

प्यारी सी मेरी बहना,
उसका भी है ये कहना,
मेरे प्यारे भईया राजा,
इस राखी पे घर को आजा,
मेरी बहना और उसकी राखी,
दोनो करती है यूँ तकाजा,
कहती हैं अब तो आजा।

प्यारी सी मेरी मईयाँ,
बनाती है जब सैवईयाँ,
कहती है जल्दी आजा,
जल्दी से आ के खाजा,
वो खीर वो पताशा,
करते है सब तकाजा,
कहते हैं अब तो आजा।

मेरी भाँज़ी और भाँज़ें,
सब उडधंग में है साँज़े,
कहते है देखो - मामा,
जल्दी से घर को आना,
और तोहफे हमारे लाना,
वो सब मुस्कुराकर ऐसे,
करते है यूँ तकाजा,
कहते हैं अब तो आजा।

प्रवीण परिहार

1/7/06

यार मेरा मुझे भुल गया ?


(यह कविता, मैंने मेरे उस दोस्त के लिए लिखी थी, जिसका कई दिनो से कोई पत्र नही आया था, पर इस कविता ने अपना कमाल दिखाया और उसने फिर से पत्र लिखा।)

यार मेरा मुझे भुल गया ?

यार मेरा मुझे भुल गया
या याद उसे मैं हुँ अब भी,
कल तक था यारो में शामिल
क्या मैं शामिल हूँ अब भी।

मुद्ददत हुई उसने मुझको
इक बार भी खत् नही भेजा,
मेरा पता वो भुल गया
या याद उसे ये है अब भी।

मेरा यार मुझसे रूठ गया
या रूठा है रब तू मुझसे,
राह तकते मैं थक तो गया पर
उम्मीद इस दिल में है अब भी।

प्रवीण परिहार